Sunday, October 17, 2021
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Hindi Blog*यदि हम थर्ड जेंडर है तो फ़र्स्ट कौन?*

*यदि हम थर्ड जेंडर है तो फ़र्स्ट कौन?*

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BY SHREYA SHUKLA

“स्त्री और पुरुष समाज निर्माण का मुख्य स्रोत हैं” यह कहते तो सबने सुना होगा| ‘समानता का अधिकार,समानता’ इन सभी शब्दों को सब ने गंभीरता से लेते हुए अक्सर स्त्रियों और पुरुषों की समानता की बात की होगी। लेकिन इन सबके बीच जो अक्सर हम भूल जाते हैं, या यूं कहें कि जिसकी बराबरी से हम चलना ही नहीं चाहते| और यदि चलना चाहें भी तो हमारा अहंकार हमें चलने नहीं देता।  LGBTQ+ समुदाय, एक ऐसा समुदाय जिसको चंद पंक्तियों में परिभाषित करना संभव नहीं। Lgbtiq+ समुदाय को कानूनन स्वीकृति तो मिल गई है लेकिन सामाजिक स्वीकृति पाना अभी भी एक चुनौती बनी हुई है।

LGBTIQ+  अर्थात  Lesbian, gay, bisexual, transgender, intersex, queer और सबसे महत्वपूर्ण “+”। जिसका सीधा सा अर्थ है LGBTIQ+ समुदाय के सदस्य इन 6 शब्दों में ही सिमटकर नहीं रहते बल्कि वे असीमित हैं| उनके अचार विचार देखकर ही उन्हें किसी श्रेणी में रखा जा सकता है।

सामाजिक स्वीकृति

क्योंकि LGBTIQ+  स्त्री या पुरुष की तथाकथित परिभाषा में फिट नहीं बैठते इसलिए उन्हें सामाजिक स्वीकृति नहीं मिल पाती। 

यहां सामाजिक स्वीकृति से अभिप्राय है LGBTIQ+ को बस स्त्री और पुरुष के समान ना समझना| यदि बात बालात्कार की करें, यदि देह व्यापार के क्षेत्र की करें तो LGBTIQ+ समुदाय को सामाजिक स्वीकृति मिलना इतना भी मुश्किल नहीं| समाज स्वीकारे या न स्वीकारे, अपनी हवस मिटाने के लिए अवश्य स्वीकारता है। हमारा समाज LGBTIQ+ समुदाय को रोज़गार देने की ओर कदम भले ही ना बढ़ाए, किंतु वेश्यावृत्ति में ढकेलने की ओर ज़रूर बढ़ाएगा।  यह सोचने वाली बात है कि यदि LGBTIQ+ समुदाय के सदस्यों को घर की बहू या दामाद नहीं बना सकते, फिर बलात्कार और वेश्यालय में उनका देह खरीदने क्यों जाया जाता है। हास्यास्पद होता है जब वेश्यावृत्ति को अश्लीलता या असभ्य समाज कहने वाले लोग वेश्यालय में जाकर देह खरीदते हैं। 

 LGBTIQ+ लोगों को सामाजिक स्वीकृति मिली नहीं है| रोज़गार हम देना नहीं चाहते| मुफ्त राशन मिलना संभव नहीं| वेश्यावृत्ति को अश्लीलता घोषित कर देना| तो क्या अप्रत्यक्ष रूप से हम यह कहना चाहते हैं कि LGBTIQ+ लोगों का जीवनयापन करना ही अनुचित है| उनको मृत्यु को अपना लेना चाहिए| क्योंकि जीवनयापन के लिए जरूरी है रोटी, कपड़ा और मकान और वो तो हम उनसे छीन रहे हैं। 

उदाहरण स्पष्टता LGBTIQ+ समुदाय को बेइज्जत करने, उनकी एक बेबुनियाद पहचान बनाने में कारगर

वहीं यदि हम अगले तर्क पर जाएं, तो LGBTIQ+ समुदाय को आम बोलचाल में छक्का, किन्नर, खसुवा, उभयलिंगी जैसे शब्दों से भी पुकारा जाता है| यह कुछ नाम जब तक LGBTIQ+ समुदाय के लोगों को पुकारने के लिए इस्तेमाल किए जाएं, तब तक तो उचित है| लेकिन जिस समय यह व्यक्ति विशेष को बेज़्ज़त करने, मजाक के रूप में, या ज़लील करने के रूप में उपयोग होने लगे उसी क्षण यह शब्द गाली का रूप ले लेते हैं।

जैसे कोई ताली बजाकर हंस रहा है, तो कैसे छक्कों की तरह ताली बजाते हो| और इससे भी ज़्यादा भयावह, आजकल टिकटोकर्स को छक्का बोलने का चलता हुआ ट्रेंड| कि किस तरीके से यदि कोई लड़का दाढ़ी नहीं रखता तो छक्का है| कोई लड़की ज़्यादा मेकअप करना बेहतर समझती है , तो छक्का है| कोई हाय हाय हाय बोले तो छक्का हो क्या? यह सभी उदाहरण स्पष्टता LGBTIQ+ समुदाय को बेइज्जत करने, उनकी एक बेबुनियाद पहचान बनाने में कारगर सिद्ध होते हैं। 

इस पितृसत्तात्मक समाज में जितना कमज़ोर स्त्री को समझा जाता है, उससे कहीं ज्यादा LGBTIQ+ समुदाय को| यदि कोई पुरुष किसी भी क्षेत्र में निर्बल है, तो उसे किन्नर, नपुंसक का नाम दे देना| जिससे लोगों द्वारा समझा जा रहा कमजोर वर्ग स्पष्ट दिखाई देता है।  

लेकिन हम हिंदुस्तान के लोग हैं, जहां हर पल अंधविश्वास चरम सीमा पर रहता है| LGBTIQ+ समुदाय को भले ही कितना भी कमज़ोर समझा जाए, किंतु बात यदि दुआ और बद्दुआ की आती है तो कोई भी पंगा नहीं लेता| भले ही LGBTIQ+ समुदाय का लोग तिरस्कार करें. लेकिन खुशी में दुआएं लेने के लिए लोग उन्हीं को बुलाते हैं। अर्थात यह स्पष्ट रूप से सिद्ध होता है कि यह समाज LGBTIQ+ समुदाय को स्वीकारता तो है| लेकिन अपनी जरूरतों के हिसाब से।  

LGBTIQ+: व्यक्तिगत समस्याएं

अब यदि बात करें कि LGBTIQ+ समुदाय की मात्र एक समस्या सामाजिक स्वीकृति पाना ही है, तो वो अनुचित होगा, उनकी व्यक्तिगत समस्याएं तो हमारी कल्पना से भी परे हैं। डेनियल मेंडोंसा ( एक प्राउड इंटरसेक्स), अपने एक tedx भाषण में स्पष्ट करती हैं कि 8 वर्ष की आयु में उनको माहवारी का अनुभव करना पड़ा| बाहर से पूर्णतः पुरुष होने के कारण उनकी खून के साथ इंटेस्टाइन बाहर आ गई। उनका आठवीं कक्षा में स्त्री या पुरुष स्पष्ट ना होने के कारण, बार-बार बलात्कार हुआ| बाहर वालों के साथ-साथ कुछ रिश्तेदारों ने भी डेनियल को सेक्स वस्तु समझ लिया। 

लेकिन इन सबसे भी दुखदाई डेनियल के पापा का बयान था ,

“तुम जैसे बच्चों को बलात्कार, भीख, वेश्यावृति जैसी चीजों की आदत डाल लेनी चाहिए तुम लोग बने ही इसीलिए हो।” 

डेनियल के पापा का बयान

अब यह कहना बिल्कुल भी अनुचित नहीं होगा कि LGBTIQ+ समुदाय को सामाजिक स्वीकृति नहीं मिली, यह तो उनकी एक समस्या है किंतु ऐसी और भी हजारों विचित्र अकाल्पनिक समस्याएं हैं जिनसे उन्हें दिन प्रतिदिन जूझना पड़ता है। 

LGBTIQ+ समुदाय की कानूनन स्वीकृति

अब यदि बात LGBTIQ+ समुदाय की कानूनन स्वीकृति की करें तो अनुच्छेद 377 के तहत समलैंगिकता को कानूनन स्वीकृति मिल गई है किंतु क्या वास्तव में उन्हें स्वीकृति मिली है?

आज शिक्षा का अधिकार LGBTIQ+ समुदाय के पास है किंतु क्या वास्तव में यह समुदाय शिक्षित है?

आज समानता के अधिकार के तहत क्या LGBTIQ+ समुदाय को समानता मिल पा रही है? 2014 में एक प्राउड intersex डैनियल मेंडोसा के याचिका दायर करने पर, मुंबई हाई कोर्ट ने LGBTIQ+ को एक अलग वॉशरूम की याचिका स्वीकार तो कर लिया|   किंतु क्या आज हर जगह स्त्री पुरुष के साथ LGBTIQ+ समुदाय को अलग वॉशरूम उपलब्ध है? अलग से वॉशरूम ना होने के कारण, वे चयन नहीं कर पाते कि वे अपने शरीर की बनावट के हिसाब से स्त्री- पुरुष वॉशरूम का इस्तेमाल करें, या फिर उनके हारमोंस उनके आंतरिक स्वभाव| जिससे उन्होंने एक जेंडर को चुना है उस हिसाब से वॉशरूम का इस्तेमाल करें। 

वर्तमान समस्या

यदि वर्तमान समस्याओं पर गौर करें तो LGBTIQ+ समुदाय के कुछ सदस्य, लोगों की खुशियों में आशीर्वाद देकर पैसे कमाते हैं, सामाजिक स्वीकृति ना मिलने के कारण यही उनकी तनख्वाह का एकमात्र जरिया है। किंतु विषाणु संक्रमण कोरोना के कारण आज प्रशासन द्वारा इसमें भी बंदिशे लगा दी गईं। वहीं यदि दूसरी और देखें तो कुछ सदस्य वेश्यावृत्ति भी अपनाते हैं। उन्हें समाज मजबूर करता है वेश्यावृत्ति को अपनाने के लिए क्योंकि वेश्यावृत्ति ही एक ऐसा कृत्य एक ऐसा माध्यम है  जिसमें समाज अपनी हवस मिटाने के लिए LGBTIQ+ समुदाय को अपनाता है। जीवन यापन के लिए यह भी जरूरी हो जाता है। किंतु देश भर में लगे कोरोना काल लॉकडाउन ने LGBTIQ+ समुदाय से यह विवश रास्ता भी छीन लिया। 

फर्स्ट जेंडर कौन

अब यदि अगले पहलू पर जाएं तो समाज द्वारा LGBTIQ+ समुदाय को थर्ड जेंडर नाम दिया गया है किंतु यदि LGBTIQ+ समुदाय थर्ड जेंडर है तो एक सीधा सा सवाल की फर्स्ट जेंडर कौन है? किंतु आज पितृसत्तात्मकता अपनी चरम सीमा पर है आज जब पितृसत्तात्मक प्रणाली से फर्स्टजेंडर के बारे में सवाल उठाए जाते हैं तो बिना किसी तर्क के जवाब आता है कि पुरुष फर्स्ट, स्त्री सेकंड और LGBTIQ+ थर्ड जेंडर है। किंतु फर्स्ट सेकंड और थर्ड का अनुमान लगाने वाले हम कौन हैं? हमें निर्णायक किसने बनाया कि हम विश्व के प्रत्येक व्यक्ति की जेंडर-संख्या निर्धारित कर सकें। 

निष्कर्ष

स्त्री, पुरुष और LGBTIQ+ समाज के तीन ऐसे पहिए हैं| जो एक दूसरे के साथ परस्पर चलने चाहिए। सभी समान है| फ़िर एक पहिए को बेइज्जत करने के लिए दूसरे पहिए का नाम लेना भी अनुचित है| लोगों को छक्का हिजड़ा जैसे नामों से बुलाना गलत है। लॉकडाउन में सभी मीडिया चैनलों ने प्रवासी मजदूरों पर कवरेज दिखाई| लेकिन LGBTIQ+  लोग सामान पीड़ा से गुजर रहे हैं| लेकिन किसी ने एक तस्वीर भी नहीं लगाई । आज विचित्र समस्याएं होने के बावजूद भी, LGBTIQ+ के लिए अलग से वॉशरूम उपलब्ध नहीं होते। 

आज यदि 100 में से दो LGBTIQ+ को समानता मिल रही है| अलग से वॉशरूम मिल रहे हैं| सामाजिक स्वीकृति भी मिल चुकी है | तो क्या यह मान लेना कि LGBTIQ+ समुदाय सामाजिक स्वीकृत है, उचित होगा? चंद लोग गिनवा देने से LGBTIQ+ समुदाय सामाजिक स्वीकृत नहीं हो जाएगा| क्योंकि देश चंद लोगों से नहीं बनता| जब सवा सौ करोड़ की जनता, एक साथ खड़ी होती है तब किसी भारत देश का निर्माण होता है। 

इसलिए हमें जरूरत है एक साथ खड़े होने की| एक साथ मिलकर LGBTIQ+ को कानूनन स्वीकृति के साथ सामाजिक स्वीकृति देने की आवश्यकता है आज। क्योंकि सामाजिक स्वीकृति के साथ-साथ और भी अकाल्पनिक समस्याएं हैं| जिन का शिकार वे हर रोज़ स्वयं होते हैं| तो हमारा कर्तव्य है कि हमसे जितना संभव हो, हम LGBTIQ+ की समस्याओं को बढ़ाने की बजाय कम कर सकें। 

26 COMMENTS

  1. Bahut sundar subect. It burning problem of world trully they r part of our society we should take attention towards problam position and place thanks u to for uprisings thizs matter. Go on

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