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देह व्यापार: एक कदम वास्तवीकरण की ओर

देह व्यापार: एक कदम वास्तवीकरण की ओर – BY SHREYA SHUKLA

आज 21वीं सदी में नारीवाद की बात तो सब करते हैं नारी और पुरुषों की समानता की बात करते हैं| लेकिन नारीवाद की होड़ में बढ़ रहे नारी वास्तुविकरण का क्या ?

युगो से ही स्त्री के वस्तुकरण का प्रमाण हमें मिलता है| फिर चाहे वह देह व्यापार के रूप में हो दहेज प्रथा के रूप में या फिर भेंट के तौर पर दी गई कन्या , कन्यादान के रूप में। हमने कोई कसर नहीं छोड़ी है|

स्त्री को मात्र एक वस्तु समझने में एक ऐसी वस्तु जिसके व्यापार के लिए भी बड़े-बड़े दिग्गज बैठते हैं बोली लगाने के लिए। फिर वह बोली दो पैग जाम के समक्ष वैश्यालय में हो या फिर घर में बैठकर शादी के लिए पक्का किया जा रहा मोल। लेकिन सवाल इसमें वस्तुकरण का उठता है|

स्त्री के वस्तु करण का मुख्य कारण क्या है?

“नग्नता और लैंगिकता” आज हम पश्चिमी पद्धति अपनाने की बात करते हैं| जिसका सीधा सा अर्थ है| एक संस्कृति को अपनाना| उसकी विचारधारा को,उसके वेशभूषा, उसकी सोच को अपनाना किंतु यह कहना बिल्कुल भी आपत्तिजनक नहीं होगा कि भारत ने पश्चिमी वेशभूषा तो अपना ली है| किंतु, अफसोस! सोच अभी भी पितृसत्तात्मक ही है| ऐसी सोच जहां स्त्री का शरीर दिखने पर उसे सेक्स की वस्तु समझ लिया जाता है। अफसोस! स्त्री को सेक्स की वस्तु समझते – समझते लोगों ने इस वस्तु का भी व्यापार बना दिया। लेकिन देह व्यापार करने के लिए पूरा दोष लड़कियों पर मढ़ देना भी उचित नहीं होगा। मात्र उन युवतियों को ही अश्लील कह देना आपत्तिजनक है। ज़रा सोचिए यदि लड़कियां देह व्यापार कर व्यापारी बनती है| तो इसका ग्राहक कौन?

स्त्री देह व्यापार करके अश्लील कहलाती हैं

यदि पोर्नस्टार अश्लील होती हैं तो उन्हें स्टार बनाता कौन? ज़ाहिर सी बात है व्यापार उसी का किया जाएगा जिसकी डिमांड होगी, तो यदि स्त्री देह व्यापार करके अश्लील कहलाती हैं| तो देह खरीदने वाला अश्लील क्यों नहीं?

स्त्री तो मजबूरीवश अपने शरीर को बेचती है, उस पुरुष को तो अश्लीलता की सूची में सर्वोच्च स्थान पर होना चाहिए| जो मजबूरी का फ़ायदा उठाकर स्त्री का देह खरीदता है- मात्र अपनी हवस मिटाने के लिए। लकिन यहां मामला यह नहीं कि कौन कितना अश्लील है| बात स्त्री के वस्तुकरण की है कि किस तरह स्त्री का वस्तुकरण हमारी दैनिक जीवनी में आ चुका है|

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स्त्री का वस्तुकरण हमारी दैनिक जीवनी में

इसके कई रूप देखने को मिलते हैं| एक छोटे से प्रचार में स्त्री को केवल मार्केटिंग अच्छी होने के लिए लाया जाना हो, या फिर दैनिक जीवन में सेक्सी, माल लग रही है, आइटम, बॉम्ब,पटाखे, ज़हर जैसे किए जाने वाले सोशल मीडिया में कॉमेंट्स । लेकिन वस्तुकरण के लिए केवल पुरुषों को ज़िम्मेदार ठहरा देना भी सही नहीं ,क्योंकि जो कॉमेंट्स पुरुष करते हैं, उनको बढ़ावा धन्यवाद अर्पण कर स्त्री ही देती है। आजकल तो स्त्रियों द्वारा ऐसे शब्दों का प्रयोग करके खुदको गड्ढे में ढकेलने के प्रमाण भी मिलते हैं।

यदि हम गौर करें तो नारी वस्तुकरण के लिए हमें उदाहरण के तौर पर देह व्यापार तक जाने की आवश्यकता नहीं, हम छोटी – छोटी चीजों में भी वस्तुकरण के उस विष को देख सकते हैं| जिसे हमने रोज़मर्रा की ज़िंदगी में इतना ग्रहण कर लिया है कि विषाणु लगना भी बंद हो गया है। हिंदुस्तान के लगभग सभी घरों में आज कन्यादान होता है जिसे आम जी माना जाता है क्योंकि यह भी हमें पीढ़ी दर पीढ़ी मिलता गया इसलिए ज़हरीला भी प्रतीत नहीं होता किंतु यदि हम शब्द पर ही जाएं तो कन्यादान क्यों?

यदि दूसरी ओर हम देखें तो सोशल मीडिया पर मीम्स पेज के फॉलोवेर्स बढ़ाने के लिए पोस्ट किए गए नग्नता वाले या फिर लैंगिकता वाले वीडियोज़ जिसमें कैप्शन के रूप में लिखे वास्तवीकरण को दर्शाते कुछ ऐसे आपत्तिजनक शब्द जिनका उपयोग करना भी अनुचित होगा। जसे स्त्री की तस्वीरें डाल कर कैप्शन में लिखना कि तस्वीर को छूने से आप इंस्टाग्राम एडल्ट के बेस्ट पेज पर पहुंच जाओगे। ज़रा सोचिए अपने पेज पर पहुंचाने के लिए किसी महिला की तस्वीर का सहारा क्यों लिया गया?

क्योंकि यहां औरत के शरीर को लाइक, फॉलोवर्स,या फ़िर पेज विज़िट बढ़ाने की वस्तु समझा गया है।इससे भी ज्यादा गौर करें तो सोशल मीडिया पर घूम रहे वह मीम्स जिसमें जरा भी कसर नहीं छोड़ी जाती नारी वस्तुकरण को बढ़ावा देने में। यह तो हो गई स्त्री-पुरुष द्वारा वास्तवीकरण को बढ़ावा देने की बात अब यदि पुरुषों द्वारा कथित बयानों पर गौर करें तो “यार लड़की फंसवा दो” जैसे शब्दों का आम तौर पर प्रयोग करना। क्यों लड़की फंसवा क्यों दो, क्या लड़की कोई वस्तु है जो उसे पुरुषरूपी मायाजाल में फसा दिया जाए।

इससे भी ज्यादा देखें तो महंगे खुशबूदार इत्र लगाते वक्त यह बोलना की लड़कियां उनकी ओर आकर्षित होंगी अब समझने वाली बात है यहां पुरुष स्त्री को एक ऐसा पदार्थ समझ रहे हैं| जो इत्र जैसे रसायन पदार्थ की ओर आकर्षित हो जाएंगी और भी ऐसे तमाम से उदाहरण जो यह दर्शा सकें की स्त्री एक वस्तु है जिसे जरूरत के प्रतिकूल प्रयोग करना है। यदि देखें तो स्त्री और पुरुष समाज के दो ऐसे पहिए हैं जो एक दूसरे के साथ परस्पर चलना चाहिए,

लेकिन लोगों द्वारा स्त्री को आज एक वस्तु के तौर पर देखना बहुत ही गलत होगा। मानवता का सबसे बड़ा प्रमाण होता है उनमें भावनाएं होना और स्त्री तो भावना का सागर है| जीव और अजीव में मूल भेद होता है की अजीव भावनाहीन होते हैं |स्त्रियों में भावना होने के बावजूद उन्हें मात्र एक सेक्स वस्तु के रूप में देखा जाता है। इन कुछ बिंदुओं से सेक्स को गलत नहीं दर्शाया गया है|

लेकिन यह बिंदु मानव को सेक्स-ऑब्जेक्ट बताने की कड़ी निंदा करते हैं। नारियों को उनकी प्रतिभाओं,उनके गुणों को भूल उनके अस्तित्व को, मात्र अपनी हवस मिटाने के लिए, स्वीकारना शत-प्रतिशत गलत है। नारी शक्ति का रूप है, नारी भावनाओं का सागर है, नारी का देह व्यापार करने का माध्यम नहीं, नारी वास्तवीकरण के लिए नहीं, बल्कि देश के, समाज के, विश्व के विकास के लिए है।नारी मानव है वस्तु नहीं, शक्ति है, भावना है, करुणा का मिश्रण है|

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